कैसे जम्मू कश्मीर में लौटी शांति, पाकिस्तान की बोलती बंद, कैसे मोदी ने 370 कलम को हटाया..

भारत–पाकिस्तान बॉर्डर वाला फॉग बॉडी स्प्रे का विज्ञापन आज फिर से बना जा है जनाब क्या चल रहा है आप बताओ शान्ति चल रही है। शायद लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एलओसी पर पूरे एक साल 25 फरवरी 2021 से सीजफायर चल रहा है। जब दोनों देशों के जनरलों ने इस मुद्दे पर एक सोचा समझा को लिया कथित तौर पर एनएसए अजित डोभाल और उसके पाकिस्तानी समकक्ष मोइन युसूफ के बीच बैकचैनल बातचीत से संबंध सुधरे खुशी की बात है कि हमारे पड़ोसी ने काफी हद तक सीजफायर का पालन किया है। 

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नमस्कार, फिर से एक नए जबरदस्त आर्टिकल में तहदिल से स्वागत है। 25 फरवरी से 30 जून 2021 के बीच पाकिस्तान की ओर से केवल छह उल्लंघन हुए। कश्मीर घाटी में एक भी हमला नहीं हुआ मगर अभी भी 60 से 70 पाकिस्तानी आतंकवादी सक्रिय हैं। मौजूदा सीजफायर से पहले अकेले जनवरी फरवरी 2021 में 740 उल्लंघन हुए थे। जबकि पूरे 2020 में 5100 सीमा पर इतनी सौदे लगभग 15 वर्ष पहले हुई थी जब 2003 में वाजपेयी और मुशर्रफ ने सीज फायर किया था। एक शांति जो पांच साल से अधिक चली और जो 2008 के 26/11 मुंबई हमलों में चकनाचूर हो गई। सीमा के पास वाला गांव छगन दा बाग में एक बार फिर खुशी का माहौल बन गया। वहा के लोग कहने लगे की हम खेती कर सकते हैं और अपनी बकरियों को बिना डर चारा खिलाने ले जा सकते हैं। ऐसा कब तक चलेगा। कोई भी तुक्का मार ले लेकिन पाकिस्तान अभी भारी कर्ज में डूबा है और उसके पास आतंक को बढ़ावा देने के पैसे नहीं मगर घटनाओं के सिलसिले ने भारत को शांतिपूर्वक तरीके से विधानसभा चुनाव कराने का मौका दिया है। 

आठ साल के लंबे अंतराल के बाद और पहली बार धारा 370 हटने पर कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद नेता और चुनावी रैली करने लगे जिससे भारत के हर कोने में होता है। उम्मीदवारों की भीड़ में इस बार एक नया मगर जाना पहचाना चेहरा दिखाई दे रहा है। जाना पहचाना इसिलए क्योंकि गुलाम नबी आजाद एक समय कश्मीर के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। सोनिया गांधी के अधीन में। और नया इसलिए क्योंकि वो दरकिनार होकर यहां वापस आ गए, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठाने के बाद। उनके उतावलेपन के लिए आजाद को AICC महासचिव के पद से हटाया गया। अनुशासनात्मक कार्यवाही समिति से गिराया गया और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर किया। अपने करियर के ढलती सांझ पर ठंड में अकेले छोड़े गए नेता कश्मीर में आकर समझो उन्हें एक नई जिंदगी मिल गई। उनकी हर रैली अब भीड़ से भरी है भले ही वे कांग्रेस के मंच पर प्रचार कर रहे हों। मगर इससे कांग्रेस डर गई कि,क्या अन्य वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह की तरह जिन्होंने पार्टी बदली। क्या अब आजाद भी भाजपा से हाथ मिलाकर अपने कश्मीर की सरकार बनाने में मदद कर सकते हैं? जल्द ही उन्हें वापस यूपी चुनावों का स्टार प्रचारक बना दिया गया तो चलो देखते हैं कि क्या आजाद जो एक आजीवन कांग्रेसी रह 9 से कूदने की कितनी संभावना रखते हैं? 
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दरअसल गुलाम नबी आजाद और नरेंद्र मोदी की प्रेम कहानी काफी समय पहले 2006 में शुरू हुई थी। जब आजाद एक आतंकवादी हमले से बचे गुजराती पर्यटकों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने की ज़हमत की समझो एक परिवार के सदस्य की तरह। उनका बंधन और गहरा हुआ जब दोनों मुख्यमंत्री थे, तो कोई आश्चर्य नहीं कि आजाद ने राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में फरवरी 2021 में मोदी की तारीफों के पुल बांधे। वो कहे की, झगड़ा जरूर हुए लेकिन आपने कभी मेरी बातों को दिल पर नहीं लिया वही मोदी जी ने भी रो रोकर नदी बहा दी और प्यार से भरे जवाब में एक मोहक प्रस्ताव रखा मैं आपको संन्यास नहीं लेने दूंगा। मैं और आवाजें आपके लिए हमेशा खुला रहेंगे। फिर जनवरी 2022 में मोदी सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा। देश का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान जिसे आजाद ने विनम्रता से स्वीकार किया। गुलाब नबी आजाद बोले की,मुझे खुशी है कि आपने मेरे चार दशक के लोक सेवक को पहचाना।

जबकि कांग्रेस के वफादारों ने उन्हें इस पुरस्कार को वापस करने के लिए ललकारा। जैसे सीपीएम के बुद्धादेव भट्टाचार्य ने किया अभी वो आजाद रहना चाहता है,गुलाम नहीं तो बताना सही होगा। लेकिन जी देश के घटने से खुशी प्रकट की। शाबाश शाबाश पुरूस्कार के लायक हमारे नायक। बाजार में चर्चा फैली कि कहीं आजाद कश्मीर में अमरिन्दर सिंह जैसा कुछ न कर दें। यानी अपनी खुद की बॉडी बनाकर चुनावों के बाद बीजेपी से हाथ मिलाना। वैसे भाजपा भली भांति जानती है कि सिर्फ उनके गढ़ जम्मू में बहुमत हासिल करने से वह पूरे कश्मीर पर दावा नहीं ठोक पाएगी। हालांकि वह परिसीमन का फायदा उठा सकते हैं। एक ऐसी प्रक्रिया जिसे चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को बदला जाता है मगर खुद के फायदे के लिए पूर्व न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक समिति ने अपने दूसरे प्रारूप में प्रस्तावित किया कि मुस्लिम बहुल कश्मीर में सिर्फ एक नई सीट बढ़ाई जाए जिससे घाटी में सीटों की संख्या 47 हो जाएगी। दूसरी ओर हिन्दू बहुल जम्मू क्षेत्र में समिति ने छह सीट बढ़ाने का सुझाव दिया जिससे वहां की संख्या 37 से 43 हो जाएगी। यह सुझाव दिया गया। बावजूद इसके कि कश्मीर घाटी की जनसंख्या 69 लाख है जम्मू के 53 लाख से कहीं ज्यादा हल्के निष्पक्षता से अगर देखा जाए तो दोनों की सीट की लगभग समान आबादी रहनी चाहिए। गणितीय रूप से कश्मीर घाटी में या तो 51 या 56 सीटें होनी चाहिए लेकिन गुप्तकर गठबंधन हमें 51 चाहते है। हालाकि,गुलाम नबी आजाद ने परिसीमन की आलोचना करने में अपना समय लिया। यह ऐसा काटा पीटा है जैसे किसी नौसिखिए दर्जी ने किया हो क्योंकि

वे जम्मू इलाके के ऐसे दुर्लभ मुस्लिम राजनेता हैं जो वह जीत सकते हैं जैसे उन्होंने 2006 के उपचुनाव और 2008 के विधानसभा चुनावों में अपने होमटाउन भद्रवाह से।

जबकि मोदी सरकार ने परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शी दिखने की कोशिश की एनसी के फारूक अब्दुल्ला,हसनैन मसूदी और अकबर लोन को समिति में शामिल करके उन्होंने स्तर को छुपाए रखा कि कैसे विधानसभा क्षेत्र की सीमाएं बदलकर सीटों में बढ़ोतरी कर दी गई। जम्मू में बीजेपी अपनी 62.5 प्रतिशत हिन्दू वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश करेगी जबकि आजाद 33.5 प्रतिशत मुस्लिम बहुल पीर पंजाल और चिनाब घाटी जिलों में ऐसा करेंगे। यदि दोनों जम्मू के दरौली सीटों पर जीत हासिल कर लें तो वे कश्मीर घाटी की अपनी पार्टी और पीपल्स कॉन्फ्रेंस की मदद से आधे रास्ते को पार कर सकते हैं। अगर इन बदलावों को स्वीकार या जबरन लागू किया जाए तो कश्मीर घाटी में चुनाव का नतीजा चाहे कुछ भी हो उसका कोई महत्व नहीं रहेगा। आजाद के लिए चुनौती यह होगी कि क्या वे कांग्रेस झंडे के बिना जीत सकते हैं और क्या वो चार कश्मीरी सीटें भी हासिल कर पाएंगे जो पार्टी ने 2014 में जीती थी? अगर भाजपा सरकार बना पाई तो वो राज्य सभा में धारा 370 को लोकतांत्रिक तरीके से हटाने में सफल होंगे। लाहौर चैंबर ऑफ कॉमर्स के प्रमुख की मानें तो पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार फिर से शुरू करने को तरस रहा है। अगर दोनों पड़ोसियों के बीच हालात सुधरे तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जल्द ही पाकिस्तान का दौरा करेंगे। पाकिस्तान के बर्ताव में काफी तब्दीली हुई है। सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा बालाकोट हमले के बाद पहली बार शांति की बात करें। इमरान खान ने महामारी पर एक वर्चुअल सार्क बैठक में कश्मीर का नाम तक नहीं लिया। 

हाफिज सईद और जकीउर रहमान लखवी के खिलाफ आतंकी फंडिग पर कार्रवाई शुरू की गई। कश्मीर दिवस जिस दिन खूब भारत विरोधी रैलियां होती आई है इस साल चुपचाप निकल गई। कैसे हो सकता है कि कश्मीर एक नई शुरुआत का मौका दे रहा और पाकिस्तान भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का गुप्त रूप से समर्थन कर रहा है। बेसबॉल की शायरी की आहट है अब अमन की सीमाओं के पास सुधर रहा कुछ पाक है ऐसी बंधती आस तो घाटी में है दिख रहे परिवर्तनों का सार। पता नहीं किस जगह कहां से जुड़ने वाले तार। क्या कश्मीर के बारे में ये बाते पता थी?

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